Sunday, May 10, 2009

अनूदित साहित्य



पंजाबी कविता

(स्व.) राम सिंह चाहल की तीन कविताएँ
हिन्दी अनुवाद : सुभाष नीरव


पंजाब के मानसा ज़िले के एक छोटे-से गाँव 'अलीसेर खुर्द' में एक छोटे किसान परिवार में 1950 में जन्म। पहले तीस वर्ष गाँव में ही गुजारे। पंजाबी यूनीवर्सिटी से एम.ए. की। सन् 2007 में निधन।

पंजाबी में चार कविता संग्रह-'अग्ग दा रंग(1975)', 'मोह मिट्टी ते मनुख(1990)', 'इथों ही किते(1992)' और 'भोंई (2000)'। हिन्दी में एक कविता संग्रह - 'मिट्टी सांस लेती है(1993)'। इसके अतिरिक्त, हिन्दी में संपादन और अनुवाद कार्य भी। भिन्न भिन्न भारतीय भाषाओं की कविताओं का पंजाबी में अनुवाद भी किया। सम्मान : नेशनल सिमपोज़ियम ऑफ पोइट्स-2004, जनवादी कविता पुरस्कार-2002, पंजाबी कविता संग्रह 'भोंइ' पर 'संतराम उदासी(लोक कवि) पुरस्कार-1994 तथा सरदार हाश्मी पुरस्कार-1992 से सम्मानित।


अपना अपना चांदनी चौक
(एक गद्य कविता)

मैं सचमुच बड़ा हो रहा हूँ। अब मैं अपने बच्चे को बड़ा होते देख रहा हूँ। हाँ, खुश हो रहा हूँ, पत्नी खुश हो रही है। देख रहा हूँ- हमारे बगैर कोई और भी क्यों खुश नहीं दिखाई दे रहा ? अजीब है कि बच्चा ज्यूँ ज्यूँ बड़ा होता जा रहा है, मैं छोटा होता जा रहा हूँ। उम्र बढ़ नहीं, घट रही है। यह बात मेरी दीवार पर लगा शीशा मुझे बता रहा है। बेजान वस्तुएँ भी बोलने लगती हैं। दीवारें बहुत कुछ कह रही हैं। साथ वाले कुएँ में से आवाज़ जा रही है। वृक्ष पर से पंछियों की आवाज़ निरंतर कह रही है- 'तुम बूढ़े होते जा रहे हो।' मैं उनकी ओर ध्यान देने लगता हूँ। गौर से देखता हूँ। कबूतरों की गुटर-गूँ सुनाई देती है। लगता है जैसे फिर से जवान हो रहा हूँ। सारे पक्षी जवान नज़र आते हैं। कोई भी बूढ़ा दिखाई नहीं दे रहा। सोचता हूँ- जो उड़ान भर सकते हैं, वे कभी बूढ़े नहीं हो सकते। कभी भीखी, कभी भदोड़, कभी लुधियाने, कभी चंडीगढ़ आदमी भी उड़ाने भर सकता है। पर वह क्या करे ? पच्चीसवें साल तक पहुँचते ही उसके पर काट दिए जाते हैं। कौन काटता है ये पंख ? पहली उड़ान और आख़िरी उड़ान एक ही दिन। शेष बची उम्र नमक-तेल के हवाले हो जाती है। अपने गाँव के कितने ही लोगों को जानता हूँ जो उम्र भर से मेरे गाँव के ‘चिमने की हट्टी’ को ही दिल्ली का क्नाट प्लेस समझे बैठे हैं, और गाँव की चौपाल को चांदनी चौक।
हर एक की अपनी अपनी उड़ान है
हर एक का अपना अपना चांदनी चौक है।
00

बस यों ही...

एक बार सोचता हूँ
मेरे मरने के साथ
सारी दुनिया ही मर जाएगी

फिर सोचता हूँ
मेरे मरने से
कहीं कुछ भी नहीं होगा

दरख्तों पर नये पत्ते
फूटते रहेंगे
फसलें फलने-फूलने से
नहीं रुकेंगी
शाम भी
इसी तरह ही आएगी
सुबह और भी
हसीन होकर मिलेगी

दो पल के लिए आँखें मूंदता हूँ
दो पल के लिए फिर जागता हूँ

तारे टिमटिमाते हैं
चूल्हे तपते हैं
रोटियाँ पकती हैं
तड़के लगने लगते हैं

नहीं होगी तो बस एक मेरी
आवाज़ नहीं होगी
वैसे मेरी आवाज़ से भी
किसी ने क्या लेना है ?

आवाज़ जब भी लगाता हूँ
अपने लिए ही लगाता हूँ
आवाज़ न भी लगाओ
कैलेंडर पर तारीख़ बदलती रहती है।
००

सवाल

मित्र-यार कहते हैं
मैं पचास का हो कर
हमेशा पच्चीस का लगता हूँ
वे एतराज़ भी करते हैं
मैं दाढ़ी क्यों रंगता हूँ

मैं बार-बार कहता हूँ
मैं सयाना नहीं बनना चाहता
तुम मुझे सयाना क्यों बनाना चाहते हो ?
पचास का हो कर भी
मैं वही लिखता हूँ
जो पच्चीस का है
और फिर जब तक
यों ही लिखता रहूँगा
लगता है-
मैं पचास से आगे नहीं पहुँच सकूंगा

देखो न
घरवाली के साथ चलता
जवान लगता हूँ
आदमी के साथ चलता
उसका हमउम्र लगता हूँ
फिर भी
मित्रों के साथ चलता
मित्रों को क्यो ठीक नहीं लगता
पता नहीं...
00
(उपर्युक्त कविताएं तथा कवि परिचय तनदीप तमन्ना के पंजाबी ब्लॉग ''आरसी'' से साभार)

Friday, April 10, 2009

अनूदित साहित्य


इरानी कविता

“मैं कविता को सम्मान का वही दर्ज़ा देती हूँ, धार्मिक लोग जो धर्म को देते हैं…”
-फ़रोग फ़रोखज़ाद

1935 में तेहरान में एक मध्यवर्गीय परिवार में जन्मी फ़रोग ने अपने 32 वर्षों के छोटे से जीवनकाल में पाँच काव्य संकलन(अन्तिम संकलन उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित), अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सराही गई डाक्युमेंटरी फ़िल्म "द हाउस इज़ ब्लैक"(1962), नाटक (लेखन और प्रस्तुति), पेंटिंग और स्केचिंग जैसी अनेक विधाओं में काम किया। उन्हें आधुनिक इरानी कविता के हिरावल दस्ते का महत्वपूर्ण सदस्य माना जाता है। शाह के सत्तापलट के बाद अयातोल्ला खोमेनी की सरकार ने उनकी कविताओं पर पाबंदी लगा दी, उनके प्रकाशक को दंडित किया गया, पर धीरे-धीरे जनभावनाओं को देखते हुए ये पाबंदियाँ कम कर दी गईं। आज भी उनकी कई किताबों के नए संस्करण निकल रहे हैं। उन पर फ़िल्में बनाई जा रही हैं और नाटकों का मंचन हो रहा है और इरानी ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में प्रगतिशील महिला आंदोलन के प्रेरणास्रोत के तौर पर उन्हें याद किया जा रहा है।

यहाँ प्रस्तुत है फ़रोग फ़रोखज़ाद की अंग्रेजी में अनूदित चार कविताओं का हिंदी अनुवाद।


फ़रोग फ़रोखज़ाद की चार कविताएं
अनुवाद एवं प्रस्तुति : यादवेन्द्र
कविताओं के साथ सभी चित्र : अवधेश मिश्र

अभिवादन सूर्य का

एकबार फिर से मैं अभिवादन करती हूँ सूर्य का
मेरे अंदर जो बह रही है नदी
मेरी अंतहीन सोच के घुमड़ते मेघों का सिलसिला
बाग में चिनार की अनगढ़ बढ़ी हुईं क्यारियाँ
गर्मी के इस मौसम में भी
सब मेरे साथ-साथ चल रहे हैं।

खेतों में रात में आने वाली गंध
मुझ तक पहुँचाने वाले कौवों के झुंड भी
मेरी माँ भी जिसका
इस आईने में अब अक्स दिखता है
और मुझे खूब मालूम है
बुढ़ापे में दिखूँगी मैं हू-ब-हू वैसी ही।

एक बार मैं फिर से धरती का अभिवादन करूँगी
जिसकी आलोकित आत्मा में
जड़े हुए है मेरे अविराम आवेग के हरे-भरे बीज।

मैं लौटूँगी, ज़रूर लौटूँगी, मुझे लौटना ही होगा
अपनी लटों के साथ, नम माटी की सुगंध के साथ
अपनी आँखों के साथ,
अंधकार की गहन अनुभूतियों के साथ,
उन जंगली झाड़ियों के साथ
जिन्हें दीवार के उस पार से
चुन चुनकर मैंने इकट्ठा किया था।

मैं लौटूँगी, ज़रूर लौटूँगी, मुझे लौटना ही होगा
प्रवेश द्वार सजाया जाएगा प्रेम के बंदनवार से
और वहीं खड़ी होकर मैं एकबार फिर से
उन सबका स्वागत करूँगी
जो प्रेम में हैं डूबे हुए आकंठ
देखो तो एक लड़की अब भी खड़ी है वहाँ
प्रेम से सिरे तक आकुल।
(‘गुलाम रज़ा सामी गोरगन रूडी’ के अंग्रेजी अनुवाद से)
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बंदी

मैं तुम्हें चाहती हूँ हालाँकि मालूम है
कभी अपने सीने से लगा नहीं पाऊँगी तुम्हें
स्वच्छ और चमकीले आकाश हो तुम
और मैं अपने पिंजरे के इस कोने में
दुबकी हुई एक बंदी चिड़िया।

सर्द और काली सलाखों के पीछे से
बढ़ती हैं तुम्हारी ओर
लालसापूर्ण मेरी कातर निगाहें
आतुर होकर देखती रहती हूँ बाट उस बांह की
जो मुझ तक पहुँचे और मैं फड़फड़ाकर खोल दूँ
अपने सारे पंख तुम्हारी ओर।

सोचती हूँ, गफ़लत के पल भी आएँगे
और मैं इस सन्नाटे की क़ैद से उड़ जाऊँगी फुर्र से
पहरेदार की आँखों के इर्द-गिर्द करूँगी चुहलबाजियाँ
और नए सिरे से श्रीगणेश करूँगी
जीवन का तुम्हारे साथ-साथ।

ऐसी ही बातें सोचती रहती हूँ
हालाँकि मालूम है
है नहीं मुझमें इतना साहस
कि मुक्ति के आकाश में उड़ चलूँ
कालकोठरी से बाहर –
पहरेदार बहुत मेहरबान भी हो जाएँ
नहीं मिलेगी मुझे इतनी साँस और हवा
कि फड़फड़ाकर उड़ सकें मेरे पंख।

हर एक चटक सुबह सलाखों के पीछे से
मेरी आँखों में आँखें डालकर मुस्कुराता है एक बच्चा
और जब मैं उन्मत्त होकर गाना शुरू करती हूँ खुशी के गीत
बढ़ आते हैं उसके मुरझाए हुए होंठ मुझ तक चूमने को मुझे।

मेरे आकाश, जब कभी मैं चाहूँ
इस सन्नाटे की कालकोठरी से भाग कर तुम तक पहुँचना
क्या सफाई दूँगी कलपते हुए उस बच्चे की आँखों को
कि बंदी चिड़ियों का ही मालिक होता है
एक ही मालिक
क़ैदखाना।

मैं वह शमा हूँ
जो आत्मदाह से रौशन करते है अपने घोंसले
यदि मैं बुझा दूँगी अपनी आग और लौ
तो फिर कहाँ बचेगा
यह अदद घोंसला भी।
(इराज़ बशीरी के अंग्रेजी अनुवाद से)
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स्नान

अठखेलियाँ करती हवा में मैंने अपने कपड़े उतारे
कि नहा सकूँ कलकल बहती नदी में
पर स्तब्ध रात ने बाँध लिया मुझे अपने मोहपाश में
और ठगी-सी मैं
अपने दिल का दर्द सुनाने लगी पानी को।

ठंडा था पानी और थिरकती लहरों के साथ बह रहा था
हल्के से फुसफुसाया और लिपट गया मेरे बदन से
और जागने-कुलबुलाने लगीं मेरी चाहतें

शीशे जैसे चिकने हाथों से
धीरे-धीरे वह निगलने लगा अपने अंदर
मेरी देह और रूह दोनों को ही।

तभी अचानक हवा का एक बगूला उठा
और मेरे केशों में झोंक गया धूल-मिट्टी
उसकी साँसों में सराबोर थी
जंगली फूलों की पगला देने वाली भीनी ख़ुशबू
यह धीरे-धीरे भरती गई मेरे मुँह के अंदर।

आनंद में उन्मत्त हो उठी मैंने
मूँद लीं अपनी आँखें
और रगड़ने लगी बदन अपना
कोमल नई उगी जंगली घास पर
जैसी हरकतें करती है प्रेमिका
अपने प्रेमी से सटकर
और बहते हुए पानी में
धीरे-धीरे मैंने खो दिया अपना आपा भी
अधीर, प्यास से उत्तप्त और चुंबनों से उभ-चुभ
पानी के काँपते होंठों ने
गिरफ़्त में ले लीं मेरी टांगें
और हम समाते चले गए एक दूसरे में…
देखते – देखते
तृप्ति और नशे से मदमत्त
मेरी देह और नदी की रूह
दोनों ही जा पहुँचे – गुनाह के कटघरे में।
(‘मीतरा सोफिया’ के अंग्रेजी अनुवाद से)
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पाप

मैंने पाप किया पर पाप में था निस्सीम आनंद
समा गई गर्म और उत्तप्त बाँहों में
मुझसे पाप हो गया
पुलकित, बलशाली और आक्रामक बाँहों में।

एकांत के उस अँधेरे और नीरव कोने में
मैंने उसकी रहस्यमयी आँखों में देखा
सीने में मेरा दिल ऐसे आवेग में धड़का
उसकी आँखों की सुलगती चाहत ने
मुझे अपनी गिरफ़्त में ले लिया।

एकांत के उस अँधेरे और नीरव कोने में
जब मैं उससे सटकर बैठी
अंदर का सब कुछ बिखर कर बह चला
उसके होंठ मेरे होंठों में भरते रहे लालसा
और मैं अपने मन के
तमाम दुखों को बिसराती चली गई।

मैंने उसके कान में प्यार से कहा –
मेरी रूह के साथी, मैं तुम्हें चाहती हूँ
मैं चाहती हूँ तुम्हारा जीवनदायी आलिंगन
मैं तुम्हें ही चाहती हूँ मेरे प्रिय
और सराबोर हो रही हूँ तुम्हारे प्रेम में।

चाहत कौंधी उसकी आँखों में
छलक गई शराब उसके प्याले में
और मेरा बदन फिसलने लगा उसके ऊपर
मखमली गद्दे की भरपूर कोमलता लिए।

मैंने पाप किया पर पाप में था निस्सीम आनंद
उस देह के बारूद में लेटी हूँ
जो पड़ा है अब निस्तेज और शिथिल
मुझे यह पता ही नहीं चला हे ईश्वर !
कि मुझसे क्या हो गया
एकांत के उस अँधेरे और नीरव कोने में।
(‘अहमद करीमी हक्काक’ के अंग्रेजी अनुवाद से)
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अपने परिचय-स्वरूप यादवेन्द्र जी का कहना है कि यूँ तो वह रहने वाले बनारस के हैं पर उनका बचपन बीता है बिहार में और बिहार के हाजीपुर, भागलपुर और पटना में उन्होंने शिक्षा प्राप्त की है, इसलिए प्राय: दफ़्तर या अन्य जगहों पर इस बात पर अक्सर विवाद कर बैठते हैं कि बिहार के मायने केवल लालू ही नहीं होता। जन्म- 1957 में। इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद थोड़े समय कोरबा(छत्तीसगढ़) में रहे, फिर 1979 से निरंतर रुड़की में हैं। यहाँ सेंट्रल बिल्डिंग रिसर्च इन्स्टीच्यूट में एक वैज्ञानिक और उप-निदेशक के तौर पर काम कर रहे हैं। ‘दिनमान’, ‘रविवार’, ‘आविष्कार’, ‘जनसत्ता’, ‘नवभारत टाइम्स’, ‘हिंदुस्तान’, ‘समकालीन जनमत’, ‘नया ज्ञानोदय’, ‘कथादेश’, और ‘कादम्बिनी’ जैसी अनेक हिंदी की शीर्षस्थ पत्र-पत्रिकाओं में मुख्यतौर पर विज्ञान लेखन करते रहे हैं। गत कुछ वर्षों से अनुवाद की ओर रुख किया है। अपनी माँ को अंग्रेजी में लिखी एक भारतीय कहानी पढ़वाने के लिए अनुवाद शुरू किया और अब इसमें उनका खूब मन रमता है।
सम्पर्क : ए-24, शांति नगर, रुड़की-247667,उत्तराखंड
फोन : 01332- 283245, 094111 11689
ई-मेल : yaa_paa@rediffmail.com

Sunday, March 8, 2009

अनूदित साहित्य


पंजाबी कविता
डा. अमरजीत कौंके पंजाबी की नई कविता पीढ़ी के एक बेहद चर्चित और होनहार कवि हैं। यह जितने पंजाबी में अपनी कविता के लिए मकबूल हैं, उतने ही हिन्दी में भी पसंद किए जाते हैं। पंजाबी-हिन्दी का गहरा ज्ञान रखने वाले कौंके जी एक सफल अनुवादक भी हैं। इन्होंने न केवल अपनी माँ बोली पंजाबी भाषा के श्रेष्ठ साहित्य का हिन्दी में प्रचुर मात्रा में सफल अनुवाद किया है, बल्कि हिन्दी के अग्रज और वरिष्ठ लेखक, कवियों की श्रेष्ठ रचनाओं का पंजाबी में अनुवाद करके अपनी माँ-बोली की झोली को और अधिक समृद्ध बनाया है। पंजाबी में इनकी छह कविता पुस्तकों के अतिरिक्त हिन्दी में भी तीन कविता पुस्तकें ''मुट्ठी भर रोशनी(1995)'', ''अँधेरे में आवाज़(1997)'' और ''अंतहीन दौड़(2006)'' प्रकाशित हो चुकी हैं। कौंके जी की कविताएं हमारे अपने समय और जीवन के यथार्थ को रेखांकित करती अद्भुत कविताएँ हैं। इनकी हर कविता ने अपनी गहरी संवेदनात्मकता के कारण मुझे इतना प्रभावित किया कि ''सेतु साहित्य'' के लिए कविताओं का चयन करते समय मेरी समझ में नहीं आया कि इनकी कौन सी कविता मैं लूँ और कौन सी छोड़ूँ। लेकिन एक ब्लॉग पत्रिका की अपनी एक सीमा होती है। लिहाजा, सात कविताएँ इनके हिन्दी कविता संग्रह ''अंतहीन दौड़'' जिनका हिन्दी अनुवाद कवि ने स्वयं किया है, से ली गई हैं और दो प्रेमपरक कविताओं का चयन तनदीप तमन्ना के पंजाबी ब्लॉग ''आरसी'' से किया गया है। अपनी माँ के निधन पर डा. अमरजीत कौंके ने कुछ कविताएँ पिछले बरस लिखी थीं जिन्हें उन्होंने अपनी त्रैमासिक पत्रिका ''प्रतिमान'' (जुलाई-सितम्बर 2008) में प्रकाशित किया था, उन्हीं में एक कविता ''माँ के नाम का चिराग'' भी यहाँ प्रस्तुत की जा रही है। मुझे उम्मीद है कि ''सेतु साहित्य'' के पाठक डा. अमरजीत कौंके की यहाँ प्रकाशित दस कविताओं को पढ़कर न केवल इनसे एक गहरा जुड़ाव महसूस करेंगे बल्कि अपने भीतर इन कविताओं पर टिप्पणी छोड़ने का दबाव भी अनुभव करेंगे।

-सुभाष नीरव
डा.अमरजीत कौंके की दस कविताएं

1
पता नहीं

पता नहीं
कितनी प्यास थी उसके भीतर
कि मैं
जिसे अपने समुद्रों पर
बहुत गर्व था
उसके सामने
पानी का एक छोटा-सा
क़तरा बन जाता

पता नहीं
कितनी अग्नि थी उसके भीतर
कि मैं
जिसे अपने सूरजों पर
बहुत गर्व था
उसके सामने
एक छोटा-सा
जुगनूँ बन जाता

पता नहीं
कितना प्यार था उसके भीतर
कि मैं
जिसे अपनी बेपनाह मोहब्बत पर
बहुत गर्व था
उसके सामने
मेरा सारा प्यार
एक तिनका मात्र रह जाता

पता नहीं
कितनी साँस थी उसके भीतर
कि मैं
जिसे अपनी लम्बी साँसों पर
बहुत गर्व था
उसके पास जाता
तो मेरी साँस टूट जाती

पता नहीं
कितने मरूस्थल थे उसके भीतर
कि मैं
जिसे अपने जलस्रोतों पर
बहुत गर्व था
उसकी देह में
एक छोटे से झरने की भांति
गिरता और सूख जाता

पता नहीं
कितने गहरे पाताल थे उसके भीतर
कि मैं
जिसे बहुत बड़ा तैराक होने का भ्रम था
उसकी आँखों में देखता
तो अंतहीन गहराइयों में
डूब जाता
डूबता ही चला जाता।
(हिंदी रूपांतर : स्वयं कवि द्वारा)
0

2
उत्तर आधुनिक आलोचक

जब मैंने
भूख को भूख कहा
प्यार को प्यार कहा
तो उन्हें बुरा लगा

जब मैंने
पक्षी को पक्षी कहा
आकाश को आकाश कहा
वृक्ष को वृक्ष
और शब्द को शब्द कहा
तो उन्हें बुरा लगा

परन्तु जब मैंने
कविता के स्थान पर
अकविता लिखी
औरत को
सिर्फ़ योनि बताया
रोटी के टुकड़े को
चाँद लिखा
स्याह रंग को
लिखा गुलाबी
काले कव्वे को
लिखा मुर्गाबी

तो वे बोले-
वाह ! भई वाह !!
क्या कविता है
भई वाह !!
(हिंदी रूपांतर : स्वयं कवि द्वारा)

3
खोये हुए रंग
(होली पर विशेष)

जाने अनजाने हमसे
जो रंग अचानक खो गए
हो सके तो
उन रंगों को ढूँढ़ कर लाएँ
आओ इस बार
होली फिर रंगों से मनाएँ।

कुछ रंग
रंगों की खोज में निकले
वापस नहीं लौटे
घर उनकी खबर ही लौटी
कुछ रंग खूनी ऋतुओं ने निगले
कुछ रंग सरहदों पर बिखरे
कुछ रंग खेतों में तड़पते
कुछ रंगों की रूहें
अभी भी सूने घरों में तिलमिलातीं
कुछ रंगों को
अभी भी उनकी माँएँ बुलातीं
ये रंग जितने भी खोए
हमारे अपने थे
इन रंगों के बिना
हमारे आँगन में
मातम है
शोक है
सन्ताप है
इन रंगों के बिना
होली रंगों की नहीं
जख्मों की बरसात है

कोशिश करें
कि कच्चे जख्मों को
फिर हँसने की कला सिखाएँ
हो सके तो
उन रंगों को
ढूँढ़ कर लाएँ
और होली इस बार फिर
रंगों से मनाएँ।
(हिंदी रूपांतर : स्वयं कवि द्वारा)
0

4
कलाइडियोस्कोप

उन्होंने कहा
कलाइडियोस्कोप ही तो है-
ज़िन्दगी
थोड़े से
चूड़ियों के टुकड़े डालो
आँख से लगाओ
और घुमाओ

मैं देर तक सोचता रहा
कि रंग-बिरंगे
काँच के टुकड़ों के लिए
मैं कौन-सी
खनखनाती कलाइयों को
सूना करूँ...।
(हिंदी रूपांतर : स्वयं कवि द्वारा)
0
5
लालटेन

कंजक कुँआरी कविताओं का
एक कब्रिस्तान है
मेरे सीने के भीतर

कविताएँ
जिनके जिस्म से अभी
संगीत पनपना शुरू हुआ था
और उनके अंग
कपड़ों के नीचे
जवान हो रहे थे
उनके मरमरी चेहरों पर
सुर्ख आभा झिलमिलाने लगी थी

तभी अतीत ने
उन्हें क्रोधित आँखों से देखा
वर्तमान ने
तिरछी नज़रों से घूरा
और भविष्य ने त्योरी चढ़ाई

इन सुलगती हुई निगाहों से डर कर
मैंने उन कविताओं को
अपने मन की धरती में
गहरा दबा डाला
अपनी तरफ से उन्हें
गहरी नींद सुला डाला
और कहा-
कि अभी कविताओं को
प्यार करने का समय नहीं

लेकिन टिकी रात के
ख़ौफनाक अँधेरे में
मेरे भीतर अब भी
उनकी भयानक हँसी गूँजती
दिल दहला देने वाली चीख़ें
विलाप की आवाज़
मेरे मन की दीवारों से
टकरा-टकरा कर लौटती
और पूछती-
कि हमारा गुनाह क्या था ?
आवाज़ पूछती
तो मेरे मन की मिट्टी काँपती
काँपती और तड़पती
और मैं
घर से छिपकर
समाज से छिपकर
पूर्वजों से छिपकर
हाथों में
स्मृतियों की लालटेन पकड़े
सारे कब्रिस्तान की परिक्रमा करता।

और कंजक कुँआरी
कविताओं की कब्रों पर
अपने लहू का
एक-एक चिराग
रोशन करता।
(हिंदी रूपांतर : स्वयं कवि द्वारा)
0

6
धीर-धीरे

इसी तरह धीरे-धीरे
ख्वाहिशें ख़त्म होती हैं
इसी तरह धीरे-धीरे
मरता है आदमी

इसी तरह धीरे-धीरे
आँखों से सपने
सपनों से रंग खत्म होते
रंगों से खत्म होती है दुनिया
सफ़ेद कैनवस पर काली चिड़ियाँ
मृत नज़र आती हैं

इसी तरह धीरे-धीरे
इबारतें कविताओं में सिमटतीं
कविताएँ पँक्तियों में सिकुड़तीं
पँक्तियाँ शब्दों में लुप्त होतीं
और शब्द शून्य में खो जाते

इसी तरह धीरे-धीरे
इन्तज़ार करते
आँखों में इन्तज़ार खत्म होता
तड़पते-तड़पते
होठों का लरजना भूल जाता
छुअन को ललकते
पोरों से कम्पन गायब हो जाता

इसी तरह धीरे-धीरे
घर इन्सान को खा जाते
दीवारें उसकी मजबूरी बन जातीं
रिश्ते जो उसके पाँव की बेडियाँ होते
आदमी उन्हें
पाजेब बना कर थिरकने लगता है

इसी तरह धीरे-धीरे
व्यवस्था के खिलाफ़ जूझता आदमी
व्यवस्था का अहम् हिस्सा बन जाता
रंगों की दुनिया में
मटमैला-सा रंग बन जाता
और कैनवस से एक दिन लुप्त हो जाता

इसी तरह धीरे-धीरे
सोचते-सोचते
आदमी जड़ हो जाता है एक दिन
पता ही नहीं चलता
कब कोई
उसके हाथों से कलम
कोई कागज़
छीन कर ले जाता

इसी तरह धीरे-धीरे
एक कवि
कवि से कोल्हू का बैल बन जाता
और आँखों पर पट्टी बाँध कर
मुर्दा ज़िन्दगी की
परिक्रमा करने लगता।
(हिंदी रूपांतर : स्वयं कवि द्वारा)
0

7
बहुत दूर

बहुत दूर
छोड़ आया हूँ मैं
वो खाँस-खाँस कर
जर्जर हुए ज़िस्म
भट्टियों की अग्नि में
लोहे के साथ ढलते शरीर
फैक्ट्रियों की घुटन में कैद
बेबसी के पुतले
मैं
बहुत दूर छोड़ आया हूँ

दूर छोड़ आया हूँ
वह पसीने की बदबू
एक-एक निवाले के लिए
लड़ा जाता युद्ध
छोटी-छोटी इच्छाओं के लिए
जिबह होते अरमान
दिल में छिपी कितनी आशाएँ
होठों में दबा कितना दर्द
मैं
कितनी दूर छोड़ आया हूँ

दूर छोड़ आया हूँ
मैं वह युद्ध का मैदान
जहाँ हम सब लड़ रहे थे
रोटी की लड़ाई
अपने-अपने मोर्चों में

पर मुझे मुट्ठी भर
अनाज क्या मिला
कि मैं सबको
मोर्चों पर लड़ता छोड़ कर
दूर भाग आया हूँ

वे सब अभी भी
वैसे ही लड़ रहे हैं
अंतहीन लड़ाई
उदास
निराश
फैक्ट्रियों में
तिल-तिल मरते
सीलन भरे अँधेरों में गर्क होते
मालिक की
गन्दी गालियों से डरते
थोड़े से पैसों से
अपना बसर करते
पल पल मरते

वे सब
अभी भी
वैसे ही लड़ रहे हैं

मैं ही
बहुत दूर
भाग आया हूँ।
(हिंदी रूपांतर : स्वयं कवि द्वारा)
0
8
माँ के नाम का चिराग़

घर को कभी न छोड़ने वाली माँ
उन लम्बे रास्तों पर निकल गई
जहाँ से कभी कोई लौट कर नहीं आता

उसके जाने के सिवा
सब कुछ उसी तरह है

शहर में उसी तरह
भागे जा रहे हैं लोग
काम-धंधों में उलझे
चलते कारखाने
काली सड़कों पर बेचैन भीड़
सब कुछ उसी तरह है।

उसी तरह
उतरी है शहर पर शाम
ढल गई है रात
जगमगा रहा है शहर सारा
रौशनियों से

सिर्फ़ एक माँ के नाम का
चिराग़ है बुझा...।
(हिंदी रूपांतर : सुभाष नीरव)
00


9
करामात

मैं अपनी प्यास में
डूबा रेगिस्तान था।

मुद्दत से मैं
अपनी तपिश में तपता
अपनी अग्नि में जलता
अपनी काया में सुलगता

भुला बैठा था मैं
छांव
प्यास
नीर...

भूल गए थे मुझे
ये सारे शब्द
शब्दों के सारे मायने
मेरे कण-कण में
अपनी वीरानगी
अपनी तपिश
अपनी उदासी में
बहलना सीख लिया था

पर तेरी हथेलियों में से
प्यार की
कुछ बूँदें क्या गिरीं
कि मेरे कण-कण में
फिर से प्यास जाग उठी

जीने की प्यास
अपने अन्दर से
कुछ उगाने की प्यास

तुम्हारे प्यार की
कुछ बूँदों ने
यह क्या करामात कर दी
कि एक मरुस्थल में भी
जीने की ख्वाहिश भर दी।
(हिंदी रूपांतर : सुभाष नीरव)

10
फूल खिलेगा

तूने एक रिश्ते पर
कितनी आसानी से
मिट्टी डाल दी
तेरे साथ वालों ने
मिट्टी फेंक-फेंक कर
इक रिश्ते की कब्र बना दी

शायद तुझे भ्रम है
कि रिश्ते यूँ खत्म हो जाते
लेकिन
बरसों बाद
सदियों बाद
जन्मों बाद
इस कब्र में से
फिर इस रिश्ते की
सुर्ख कोंपल फूटेगी

फिर इस कब्र में से
प्यार का महकता फूल खिलेगा।
(हिंदी रूपांतर : सुभाष नीरव)
00




जन्म : 27 अगस्त 1964
शिक्षा : एम.ए.(पंजाबी), पीएच.डी ।
प्रकाशन : हिन्दी में ''मुट्ठी भर रोशनी(1995)'', ''अँधेरे में आवाज़(1997) और ''अंतहीन दौड़(2006)'' काव्य संग्रह।

पंजाबी में ''दायरियाँ दी कब्र चों(1985)'', ''निर्वाण दी तलाश विच(1987)'', ''द्वन्द्व कथा(1990)'', ''यकीन(1993)'', ''शब्द रहणगे कोल(1996)'' तथा ''स्मृतियों की लालटेन( 2002, 2004)'' काव्य संग्रह।

अनुवाद : हिन्दी के दिग्गज लेखकों- डा. केदार नाथ सिंह की ''अकाल में सारस'', श्री नरेश मेहता की ''अरुण्या'', अरुण कमल की ''नये इलाके में'', मिथिलेश्वर की ''उस रात की बात'', मधुरेश की ''देवकी नंदन खत्री'', हिमांशु जोशी की ''छाया मत छूना मन'', बलभद्र ठाकुर की ''राधा और राजन'' पुस्तकों का पंजाबी में अनुवाद। पंजाबी कवि रविंदर रवी, परमिंदर सोढ़ी, डा. रविंदर, सुखविंदर कम्बोज की पुस्तकों का हिन्दी में अनुवाद।

संपादन : त्रैमासिक पंजाबी पत्रिका ''प्रतिमान'' का निरंतर संपादन।

सम्मान एवं पुरस्कार : भाषा विभाग, पंजाब से हिन्दी पुस्तक ''मुट्ठी भर रोशनी'' के लिए 1995 का सर्वोत्तम हिन्दी पुस्तक पुरस्कार। गुरू नानक देव यूनिवर्सिटी, अमृतसर से पुस्तक ''शब्द रहणगे कोल'' के लिए वर्ष 1998 में मोहन सिंह माहिर पुरस्कार। समूचे काव्य लेखन के लिए इयापा(I.A.A.P.A.), कैनाडा सम्मान से सम्मानित।

अन्य : भारत की अनेक भाषाओं में कविताओं का अनुवाद प्रकाशित।

सम्प्रति : लेक्चरार ।

सम्पर्क : 718, रणजीत नगर- ए, भड़सों रोड, पटियाला-147 001(पंजाब)
दूरभाष : 0175-5006463, 098142 31698(मोबाइल)

ई मेल : amarjeetkaunke@yahoo.co.in

Tuesday, February 3, 2009

अनूदित साहित्य


पंजाबी कविता

तनदीप तमन्ना की पाँच कविताएँ
हिंदी रूपान्तर : सुभाष नीरव

1
ख़ुदा ख़ैर करे

मैं सरसरी पूछ बैठी-
“क्या हाल-चाल है ?”
तेरा जवाब था कि
“जो आग लगने के बाद
सरकंडों की झाड़ियों का होता है…”

अधर सिल गए थे मेरे
कुछ पलों का सन्नाटा
तेरा दर्द
मेरी रूह के हवाले कर गया था।

तूने कहा-
“…चाहे बातें न कर
पर
हुंकारा तो भर…
शाम आराम से बीत जाए…”

मैंने कहा-
“…कहीं शाम के साथ
बातें भी बीती न हो जाएं
हुंकारा भरते-भरते
कोई बात न शुरू हो जाए।”

तूने देखा हसरत भरी नज़रों से
और फिर
ठंडी आह भरकर रह गया था।

तूने वास्ता दिया था
“बाहरों में तो न मिला कर
पतझर-सा चेहरा लेकर…”

मैंने कहा-
“तेरा गिला भी जायज़ है
पर मैं तुझे
बारिश में तो मिलती हूँ
आँखों में झड़ी लेकर…।”

अब हम दोनों चुप खड़े थे !

मेरी आँखों के अंदर की
शोख तितली
तेरे मन के
मनचले भौंरे का हाथ थाम
तर्क के ग्लेशियर की
सीमा पार कर चुकी थी
और हम
सूरज को क्षितिज पर
अस्त होता देख रहे थे।
00

2
कुछ कहना तो ज़रूर था

आज
कुछ कहना तो था
शब्दों के
दाँत भिच गए…
ख़यालों के
होश उड़ गए
अहसासों को
लकवा मार गया
इशारे आँखों में ही
पथरा गए

वैसे
आज
कुछ कहना तो
ज़रूर था !
00

3
पिरामिड

सदियों पहले
किसी ने दफ़ना दिया था मुझे
देह पर चंदन का लेप कर
हीरे, चांदी और सोने से लाद कर
गहरी नींद की दवा दे कर!

पर मैं
मैं उस पिरामिड में से
हर रात जागती हूँ
तारों की रोशनी में
आहिस्ता से पैर धर
हवा के मातमी
सुरों की हामी भर
धरती का चप्पा-चप्पा
पर्वत, नदियाँ, समन्दर,
ज्वालामुखी, ग्लेशियर घूम
तुझे किसी योग-मुद्रा में लीन
तपस्या करते देख
तेरे हठ को सलाम कर
अगली बार
समाधि खुलने की आस लिए
पौ फटने से पहले ही
आँखों में से ढ़ुलकदे मोतियों को
तेरे बे-रहम शहर की
रेत में बीज कर
ताबूत की ओर लौट आती हूँ !
00

4
कस्तूरी गायब है

यहाँ घरों में
सब कुछ है
पर कुछ भी तो नहीं…
यहाँ भरे हुए बर्तन खनकते हैं।

और इन घरों के बाशिंदे
मरुस्थल में
तड़फती मछलियाँ हैं।

हज़ारों रोशनियों में
सिल्क के पर्दों के पीछे
सूरज को पकड़ने के लिए
साये जीते हैं।

परबतों की चीख
नदी का दर्द
समाये रह जाते हैं
दिलकश चित्रों के अंदर।

एक्वेरिअम में पाल कर मछलियाँ
पालते हैं भ्रम
ठांठे मारते समुद्र का।
आलीशान घरों के कमरे
सिकुड़ जाते हैं
और पीर
और भी बढ़ जाती है
महकों के प्यासे मृगों की।
00
5
दर्द

अतीत का
ज़िक्र छिड़ते ही
हाथों के बीच का आटा
खमीर बन गया है

एक रात
हाँ, उस रात
तेरे दर्द के जंगल में से
गुजरी थी
पंख कतरे गए थे मेरी
चीख के।

जंगल की ख़ामोशी
परतें बन चढ़ गई थी
मेरे जेहन पर।

काले फ़नीअर
विष त्याग गए थे
शब्द रहित दर्द
बाहें खोल कर आया।

जब हम जुदा हुए तो
तेरा लावा…
मेरा ग्लेशियर…
बांहों में भर
दर्द
किसी पहाड़ी घर की
चिमनी में से
धुआँ बनकर निकल रहा था।
00

पंजाबी की युवा कवयित्री। कनाडा में रहते हुए अपनी माँ-बोली पंजाबी भाषा की सेवा अपने पंजाबी ब्लॉग “आरसी” के माध्यम से कर रही हैं। गुरूमुखी लिपि में निकलने वाले उनके इस ब्लॉग में न केवल समकालीन पंजाबी साहित्य होता है, अपितु उसमें पंजाबी पुस्तकों, मुलाकातों और साहित्य से जुड़ी सरगर्मियों की भी चर्चा हुआ करती है। इधर “आरसी” में हिन्दी भाषा के साहित्य के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं के अनुवाद को भी तरजीह दी जा रही है।
“आरसी” का लिंक है- www.punjabiaarsi.blogspot.com
तनदीप तमन्ना का ई मेल है- tamannatandeep@gmail.com

Thursday, January 8, 2009

अनूदित साहित्य


ओड़िया कविता

सीताकांत महापात्र की कविताएं
अनुवाद : गगन गिल/सुभाष नीरव
चित्र : अवधेश मिश्र



परछाईं


देख रहा था काफ़ी दिनों से
वो वहीं खड़ी है
पैर जमाये, सिर झुकाये
ठीक मेरे फाटक के आगे
अडिग मूरत जैसी।

चाहती तो अचानक ही फाटक खोल
अंदर आ सकती थी
बरामदे, ड्राइंग-रूम से होती हुई
यहाँ तक कि सीधे मेरे शयन-कक्ष में आ सकती थी
मेरी किताबें, मेरे ख़याल
मेरी शेष ज़िंदगी, मेरे सपने
जो भी चाहती ले जा सकती थी
लेकिन मूर्ख ऐसा कुछ नहीं करती
यहाँ तक कि झिझकती-सकुचाती आवाज़ में औरों की तरह
चबूतरे पर चढ़कर
‘महाराज-महाराज’ कहकर भी नहीं बुलाती।

यहाँ से राह बदल कर लौट भी नहीं जाती
धूप, ताप, ठंड, पाला सब सह कर
चाँदनी रात में डरौने की तरह
वहीं उसी तरह खड़ी रहती है।

फाटक भी तो नहीं खोलता
पर न जाने वो कैसा जादू जानती है कि
मेरे सारे सपनों में आकर उपस्थित हो जाती है
और उसके बाद ही, बेटी-बेटा, पत्नी और ख़ुद मैं
कुर्सियों पर आमने-सामने बैठ होते हैं
चाय पीते समय भी लगता है
हम सभी नीले आकाश में टिमटिमाते नक्षत्र हैं
अचानक सारी बातचीत अटपटी लगने लगती है
कोई बात खत्म करने से पहले
अनमना होकर मैं चुप हो जाता हूँ।

हो सकता है उसी के डर से
जो चिड़ियाँ घर के सामने वृक्ष की डालों पर बैठ
गीत गाया करती थीं
और मैं सोचा करता था
वे गा रहीं हैं सिर्फ़ मेरे लिए
न जाने कहाँ उड़ जाती हैं
बेल-बूटे कमज़ोर और सूखे लगने लगते हैं
चाँद की रौशनी भी मैली लगने लगती है
लगता है, अगर कुछ और दिनों तक वह इसी तरह
वहाँ खड़ी रही तो
चाँद पूरी तरह स्याह हो जाएगा
चिड़ियाँ चहकना बिसर जाएंगी
सारे शब्द कहीं गुम हो जाएंगे।

नौकर-चाकर, पत्नी, बच्चे जिससे भी पूछो
वे कहते हैं- कहाँ है ?
फाटक के पास तो नंगी हवा के सिवा
और कोई भी तो नहीं !
मैं कितनी तरकीबें लगाता हूँ
उसे सम्मानित मेहमान बनाकर
अंदर घर में ले आऊँ
और उसमें असफल होने पर
डरा-धमका कर दुश्मन की तरह भगा दूँ।

लेकिन कोई लाभ नहीं होता
क्या रात, क्या दिन
क्या आषाढ़, क्या फाल्गुन
सिर झुकाये, सपने में देखे सपने-सी
वह वहीं उसी तरह खड़ी रहती है।
00

बहता नहीं समय

बहता नहीं समय
बह जाते हैं लोग
सारे प्राणी ही बह जाते हैं।

भूरा कोटधारी बादल
चबूतरे की दीवार से टिके बैठे
आकाश की ओर देखते चित्र-प्रतिमा
पिताजी को अलविदा-अलविदा कह कर बैठ जाता है
उसके दूसरे ही दिन
पिता जी हमारी ओर पीठ किए
आहिस्ता-आहिस्ता दूर बहते चले जाते हैं
उसी दिशा में
आसमान के नीचे विदा हो रहे सूर्य के साथ।

अलविदा-अलविदा कह कर झड़ जाते हैं पत्ते
रोते हुए वृक्ष को अगले दिन
काट कर ले जाते हैं लकड़हारे
वो विदा हो जाता है
न जाने कब से खड़ा था मिट्टी पर !

अकस्मात् दिखने लग जाते हैं
घर, घाट, नदी, किनारे, जंगल
पत्नी, पुत्र, संगी-साथी
अनदेखे समय के सारे दृश्य
बह जाते हैं अंधकार की ओर ।

वह अंधेरा तेरा साया है
तुझे तो पता होगा
क्यों और कहाँ
बह जाते हैं
हम सब ?
00
(ओड़िया के प्रख्यात कवि सीताकांत महापात्र की कविताओं का पंजाबी अनुवा्द हिंदी कवयित्री गगन गिल ने किया है जिसे “शब्दां दा अकाश ते होर कवितावां” शीर्षक से पुस्तक रूप में साहित्य अकादमी, दिल्ली द्वारा वर्ष 1995 में प्रकाशित किया गया था। उक्त दोनों कविताएं इसी पंजाबी कविता संग्रह से ली गई हैं और पंजाबी से इनका हिन्दी अनुवाद सुभाष नीरव ने किया है)


जन्म : 17 सितंबर 1937, कटक (उड़ीसा)।
उड़िया के प्रख्यात कवि। भारत सरकार और महत्वपूर्ण राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय संस्थानों में उच्चस्थ पदों पर रहे। कविता, निबंध, यात्रा-संस्मरण आदि विधाओं पर अनेक पुस्तकें। तीस से अधिक कविता की पुस्तकें प्रकाशित। अनेकों कविताओं का भारतीय भाषाओं तथा विदेशी भाषाओं में अनुवाद। ज्ञानपीठ अवार्ड(1993), सरला अवार्ड(1985), उड़िया साहित्य अकादमी अवार्ड( 1971 व 1984), साहित्य अकादमी अवार्ड(1974) के साथ-साथ अन्य कई सम्मानों से सम्मानित। संप्रति : नेशनल बुक ट्रस्ट के अध्यक्ष। पता : श्रद्धा, 21, सत्य नगर, भुवनेश्वर (उड़ीसा)।

Wednesday, December 17, 2008

अनूदित साहित्य


मलयालम कविता


के. सच्चिदानंदन की पाँच कविताएं
अनुवादक : डा. विनीता/सुभाष नीरव

मैं लिख रहा हूँ

गली में गिरी सुबह की ओस पर
मैं लिख रहा हूँ तेरा नाम
जैसे पहले भी किसी कवि ने
लिखा था नाम- स्वतंत्रता का
हरेक वस्तु पर।

तेरा नाम लिखने लगा तो
मिटाना कठिन हो जाएगा
धरती और आकाश पर
क्रांति के साथ
प्रेम के लिए भी जगह है
तेरे नाम की सेज पर
सो रहा हूँ मैं
तेरे नाम की चहचहाट के साथ
जागता हूँ मैं
जहाँ-जहाँ मैं स्पर्श करता हूँ
उभर आता है तेरा नाम
झरते पत्तों के घसमैले रंगों पर
प्राचीन गुफाओं की स्याह दीवारों पर
कसाई की दुकान के दरवाजे पर
गीले रंगों पर
ताजे लहू पर
जुत रहे खेतों पर
चांदनी के फड़फड़ाते पंखों पर
काफी और नमक पर
घोड़े की नाल पर
नृतकी की मुद्रा पर
तारों के कंधों पर
शहद औ’ ज़हर पर
नींद पर, रेत पर, जड़ों पर
कुल्हाड़ी पर, बन्दूक की गोली पर
फांसी के तख़्ते पर
मुर्दाघर के ठंडे फर्श पर
श्मसान-शिला की चिकनी पीठ पर।
हमें क्या पता

हम दो बच्चें हैं
जो मम्मी-डैडी का खेल खेल रहे हैं
जानते नहीं हम आलिंगन का अर्थ
हमें क्या पता चुम्बन का विद्युतमयी प्रवाह
बस, यूँ ही स्पर्श कर लेते हैं
कुछ पत्तियाँ...
कुछ फूल...
कुछ फल...

बड़ी ममता से निहार रही है प्रकृति हमें
ज़िन्दगी में ठसाठस भरी
वंश-तृष्णा की
धीमी लौ को
अमर होने की इस
अर्थहीन इच्छा में
सुनो-
रात आँगन में दौड़ती चली जा रही है।


पीला-हरा

जब पीला पत्ता झरता है
हरा पत्ता हँसता नहीं
वह सिर्फ़ थोड़ा-सा कांप उठता है
उस फौजी की तरह
जो देख रहा है
गोली खाकर गिरते अपने पड़ोसी को।
सर्दी की बर्फीली छुअन से
जब फूलने लगती हैं उसकी नसें
ध्यान आता है उसे
नियति का रंग है पीला
और वह हो जाता है सुन्न।

और पीला पत्ता सड़ता है वेग से
ताकि वह बन सके हरा पता
खिला सके फूल
अगली बसंत में
हरा पत्ता नहीं जानता कुछ भी
मरने के बाद आत्माओं के
सफ़र के बारे में।

हरे पत्ते का दुख पीला पीला है
पीले पत्ते का सपना हरा-हरा
इसलिए जब नौजवान हँसते हैं
सूरजमुखी खिलते हैं
और.... हाँ, इसीलिए बूढ़ों के
आँसू झिलमिलाते हैं
मणियों की तरह...।

पागल

पागलों की कोई जाति नहीं होती
न धर्म होता है
वे लिंग भेद से भी परे होते हैं
उनका चाल-चलन अपना ही होता है
उनकी शुद्धता को जानना
बड़ा कठिन है।

पागलों की भाषा सपनों की भाषा नहीं
वह तो किसी दूसरे ही यथार्थ की(होती है)
उनका प्रेम चाँदनी है
जो पूर्णिमा में उमड़ता-बहता है।

जब वे ऊपर की ओर देखते हैं
तो ऐसे देवते लगते हैं
जिन्हें कभी सुना-गुना ही न हो
जब हमें लगता है कि
यूँ ही कंधे झटक रहे हैं वे
तो उड़ रहे होते हैं उस वक्त वे
अदृश्य पंखों के साथ।

उनका विचार है कि
मक्खियों में आत्मा होती है
देवता टिड्डे बन कर हरी टांगों पर फुदकते हैं
कभी-कभी तो उन्हें वृक्षों से
रक्त टपकता दिखाई देता है
कभी-कभी गलियों में
शेर दहाड़ते दिखाई देते हैं।

कभी-कभी बिल्ली की आँखों में
स्वर्ग चमकता देखते हैं
इन कामों में तो वे हमारे जैसे ही हैं
फिर भी चींटियों के झुण्ड को गाते हुए
केवल वही सुन सकते हैं।

जब वे सहलाते हैं पवन को तो
धरती को धुरी पर घुमाते हुए
आंधी को पालतू बनाते हैं
जब वे पैरों को पटक कर चलते हैं तो
जापान के ज्वालामुखी को
फटने से बचा रहे होते हैं।

पागलों का काल भी दूसरा होता है
हमारी एक सदी
उनके लिए एक क्षण भर होती है
बीस चुटकियाँ ही काफी है उनके लिए
ईशा के पास पहुँचने के लिए
आठ चुटकियों में तो वे बुद्ध के पास पहुँच जाएंगे।

दिन भर में तो वे
आदिम विस्फोट में पहुँच जाएंगे
वे बेरोक चलते रहते हैं
क्योंकि धरती चलती रहती है

पागल
हमारे जैसे
पागल नहीं होते।

पंचभूतों ने जो मुझे सिखलाया

धरती ने मुझे सिखलाया है-
सब कुछ स्वीकारना
सब कुछ के बाद
सबसे परे हो जाना
हर ऋतु में बदलना
यह जानते हुए कि
स्थिरता मृत्यु है
चलते चले जाना है
अन्दर और बाहर।

अग्नि ने मुझे सिखलाया है-
तृष्णा में जलना
नाचते-नाचते हो जाना राख
दुख से होना तपस्वी
काली चट्टानों के दिल और
सागर के गर्भ में
प्रकाश जागते हुए
ध्यानमग्न होना।

जल ने मुझे सिखलाया है-
बिना चेतावनी
आँख और बादल में से
टप टप टपकना
आत्मा और देह में
गहराई तक रिसना
और इन दोनों को देना संवार
फूल और आँसू से
स्वयं होना मुक्त
नाव और ठांव से
और विलय हो जाना
स्मृतियों के किनारे
उस अतल नील में।

पवन ने मुझे सिखलाया है-
बांस के झुरमुट में निराकार गाना
पत्तियों के माध्यम से भविष्य बतलाना
बीजों को पर-पंख
हवा-सा दुलराना
आंधी-सा रुद्र होना।

पंचभूतों ने मुझे यह सिखलाया-
जोड़ना-जुड़ना
टूटना-बिखरना
रूप बदलते रहना
जब तक न मिले मुक्ति
मुझे सारे रूपों से।
00

(मलयालम के प्रख्यात कवि के. सच्चिदानंदन की कविताओं का पंजाबी अनुवाद डा. वनीता ने किया है जिसे “पीले पत्ते का सपना” शीर्षक से पुस्तक रूप में साहित्य अकादमी, दिल्ली द्वारा वर्ष 2003 में प्रकाशित किया गया था। डा. वनीता स्वयं पंजाबी की चर्चित कवयित्री और आलोचक हैं। उक्त पाँचों कविताएं इसी पंजाबी कविता संग्रह से ली गई हैं और पंजाबी से इनका हिन्दी अनुवाद सुभाष नीरव ने किया है )

मलियालम के प्रसिद्ध कवि के. सच्चिदानंदन का जन्म 1946 में हुआ। वह कई वर्षों तक ‘इंडियन लिटरेचर’ के संपादक रहने के बाद ‘साहित्य अकादमी’ के सचिव भी रहे। वह अन्य कई संस्थाओं से संबद्ध रहे। इन्हें केरल साहित्य अकादमी के चार तथा अन्य कई पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। इनकी बहुत सी कविताओं का अनुवाद भारत और विश्व की अनेक भाषाओं में हो चुका है। इन्होंने नाटक और आलोचना के क्षेत्र में भी विशेष कार्य किया है। इनके उन्नीस कविता संग्रह, सामाजिक और आलोचना से संबंधित सोलह पुस्तकें और कई अनुवाद प्रकाशित हो चुके हैं।

Thursday, October 9, 2008

अनूदित साहित्य


पंजाबी कविता

गुरप्रीत की सात कविताएं
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

(1) घर

गुम हुई चीज को
तलाशने के लिए
खंगाल डालती थी
घर का हर अंधेरा-तंग कोना
मेरी माँ !
बीवी भी अब ऐसा ही करती है
और अपनी ससुराल में बहन भी !

चीज़ों के गुम होने
और इनके रोने के लिए
अगर घर में अंधेरी-तंग जगहें न होंती
तो घर का नाम भी
घर नहीं होता।

(2) दोस्ती

जब छोटे-छोटे कोमल पत्ते फूटते हैं
और खिलते हैं रंग-बिरंगे फूल
मैं याद करता हूँ जड़ें अपनी
अतल गहरी ।

जब पीले पत्ते झड़ते हैं
और फूल बीज बन
मिट्टी में दब जाते हैं
मैं याद करता हूँ जड़ें अपनी
अतल गहरी ।

(3) जीने की कला

ये अर्थ
जो जीवंत हो उठे
मेरे सामने
अगर ये शब्दों की देह से होकर
न आते
तो कैसे आते
मैं हँसता हूँ, प्यार करता हूँ
रोता हूँ, लड़ता हूँ
चुप हो जाता हूँ
पार नहीं हूँ सब कुछ से
मुझे जीना आता है
जीने की कला नहीं।

(4) माँ

मैं माँ को प्यार करता हूँ
इसलिए नहीं
कि जन्म दिया है
उसने मुझे

मैं माँ को प्यार करता हूँ
इसलिए नहीं
कि पाला-पोसा है
उसने मुझे

मैं माँ को प्यार करता हूँ
इसलिए
कि उसको
अपने दिल की बात कहने के लिए
शब्दों की ज़रूरत नहीं पड़ती मुझे।

(5) पिता होने की कोशिश

दु:ख
गठरी मेंढ़कों की
गाँठ खोलता हूँ
तो उछ्लते-कूदते बिखर जाते हैं
घर के चारों तरफ

हर रोज़
एक नई गाँठ लगाता हूँ
इस गठरी में

कला यही है मेरी
दिखने नहीं दूँ
सिर पर उठाई गठरी यह
बच्चों को।
(6) चिट्ठियों से भरा झोला

कविता आई सुबह-सुबह
जागा नहीं था मैं अभी
सिरहाने रख गई- ‘उत्साह’।

उठा जब
दौड़कर मिला मुझे ‘उत्साह’
कविता की चिट्ठियों से भरा झोला थमाने।

एक चिट्ठी
मैंने अपनी बच्ची को दी
‘पढ़ती जाना स्कूल तक
मन लगा रहेगा…’

एक चिट्ठी बेटे को दी
कि दे देना अपने अध्यापक को
वह तुझे बच्चा बन कर मिलेगा…

चिट्ठी एक कविता की
मैंने पकड़ाई पत्नी को
गूँध दी उसने आटे में।

पिता इसी चिट्ठी से
आज किसी घर की
छत डाल कर आया है!

नहीं दी चिट्ठी मैंने माँ को
वह तो खुद एक चिट्ठी है !

(7) राशन की सूची और कविता

5 लीटर रिफाइंड धारा
5 किलो चीनी
5 किलो साबुन कपड़े धोने वाला
1 किलो मूंगी मसरी
1 पैकेट सोयाबीन
पैकेट एक नमक, भुने चने
थैली आटा
इलायची-लौंग 25 ग्राम…

कविता की किताब में
कहाँ से आ गई
रसोई के राशन की सूची ?

मैं इसे कविता से
अलग कर देना चाहता हूँ
पर गहरे अंदर से उठती
एक आवाज़
रोक देती है मुझे
और कहती है –
अगर रसोई के राशन की सूची
जाना चाहती है कविता के साथ
फिर तू कौन होता है
इसे पृथक करने वाला
फैसला सुनाता ?

मैं मुस्कराता हूँ
राशन की सूची को
कविता की दोस्त ही रहने देता हूँ।

दोस्तो !
नाराज़ मत होना
यह मेरा नहीं मेरे अंदर का फैसला है
अंदर को भला कौन रोके !

सूची अगर तुम
मेरी रसोई की नहीं
तो अपनी की पढ़ लेना

कविता अगर तुम
मेरी नहीं
तो अपने अंदर की पढ़ लेना।
0
गुरप्रीत
संप्रति : पंजाबी अध्यापक ।
प्रकाशित कविता पुस्तकें : शबदां दी मरज़ी(1996), अकारन(2001)
पुरस्कार : कविता पुस्तक “शबदां दी मरज़ी” को गुरू नानक देव युनिवर्सिटी, अमृतसर की ओर से वर्ष 1996 का प्रो0 मोहन सिंह कविता पुरस्कार।

अन्य रुचियाँ : वाटर कलर में कुछ पेंटिग्स जो किताबों और पत्रिकाओं के टाइटिल पर लगीं। कुछ रेखांकन ‘संडे ऑबजर्वर’, ‘हंस’, ‘जनसत्ता’, ‘वागर्थ’ और ‘नया ज़माना’ आदि पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं।

संपर्क : वार्ड नं0 9
रामसिंह कुन्दन वाली गली
सिनेमा रोड, मानसा- 151505(पंजाब)
दूरभाष : 09872375898
ई-मेल : gurpreet-sukhan@yahoo.com